मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

दिल्ली की जमा -मस्जिद , एक ऐतिहासिक मुग़ल स्मारक

यूँ तो हम दिल्ली के मूल निवासी हैं। लेकिन कहते हैं न की चिराग तले अँधेरा होता है। कुछ ऐसा ही हमारे साथ भी हुआ। जी हाँ, जिंदगी में पहली बार अवसर मिला , ज़ामा मस्जिद जाने का अभी हाल ही में।

आइये आप को भी दर्शन कराते हैं इस ऐतिहासिक मुग़ल स्मारक की।

दरिया गंज से लाल किला जाने वाली सड़क पर सुभाष पार्क से होकर रास्ता जाता है , ज़ामा मस्जिद के मुख्य द्वार तक। ज़ामा मस्जिद में प्रवेश करने के लिए तीन द्वार खुले रहते हैं। पूर्व, उत्तर और दक्षिण की ओर



मुख्य द्वार --पूर्व की ओर

रास्ते में मिलेंगी सैकड़ों दुकाने।


मुख्य प्रवेश द्वार
अन्दर से एक नज़ारा

प्रांगन में एक छतरी, उसके आगे जलाशय , उसके आगे नमाज़ हॉल


नमाज़ अदा करने का हॉल। नमाज़ के समय गैर मुस्लिम और महिलाओं का प्रवेश बंद कर दिया जाता है।


दूसरी तरफ से



दक्षिण में गेट नंबर एक की सीढियां और दूर मछली बाज़ार । यहाँ बहुत भीड़ भाड़ रहती है।

मुख्य द्वार से एक द्रश्य ---दूर नज़र आता हुआ --लाल किला


मुग़ल बादशाह शाहजहाँ ने दिल्ली में दो ऐतिहासिक निर्माण किये थे । एक ज़ामा मस्जिद और दूसरा लाल किला
दिल्ली आयें तो दोनों जगह जाना न भूलें।

6 टिप्‍पणियां:

  1. aap kripya blraj mdhok ki pustk itihas ki bhynkr bhoole avshy pdhiye kyonnkiyhjo aap ne likha bilkul hi astya hia jb aap use pdh lenge to aa[p ko vasvikta pta chl jayegi ki yh bhvn kya hai aur is desh me aap jaise mhan log kya 2 khte hain
    dr.vedvyathit@gmail.com

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  2. वेद जी , हमने तो खाली वर्तमान की झलकियाँ दिखाई हैं।
    आप भी आनंद लीजिये न।
    किताब भी पढ़ लेंगे।

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  3. डॉ टी एस दराल जी हम बरसो दिल्ली मै रहे लेकिन कभी भी ज़ामा मस्जिद नही गये, हजारो बार पास से निकल गये... आज आप दुवारा सुंदर सुंदर चित्र को अति सुंदर विवरण पढ कर मन ललचा रहा है, अगली बार जरुर देखेगे ज़ामा मस्जिद को , वेसे अब मै एक सुची बना रहा हुं, ओर आने से पहले अपने समय के हिसाब से देखेगे कि कोन कोन सी जगह देखी जा सकती है, धीरे धीरे अपना पुरा घर देखने की इच्छा है मन मै.
    आप का धन्यवाद

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  4. @दराल सर,
    जामा मस्जिद तो मुगल शिल्प का अद्भभुत नमूना है...लेकिन वहां तक पहुंचने के जो रास्ते हैं, वहां चलना बड़ा ही जीवट का काम है...मैंने एक बार कोशिश की थी...वहां इंच-इंच पर कब्ज़ा जमाए बैठे काम-धंधा करने वाले...मछली समेत कैसी कैसी बदबू...मुझसे आगे बढ़ा नहीं गया और मैं लौट आया...

    @वेद व्यथित जी,
    डॉक्टर साहब ने तो सिर्फ फोटो में झलकियां ही दिखाई हैं...पोस्ट में कहीं भी उन्होंने ऐसा कुछ नहीं लिखा जिसे असत्य की श्रेणी में रखते हुए आपको तंज की तरह महान शब्द का इस्तेमाल करना पड़ा...

    जय हिंद...

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  5. आपने बिलकुल सही लिखा है खुशदीप भाई।
    वहां की भीड़ भाड़ देखकर हम भी कभी हिम्मत नहीं जुटा पाए।
    हालाँकि नई सड़क जाने के लिए कई बार वहां से गुज़रे।
    लेकिन अब एक तो मछली बाज़ार वहां से हट गया है।
    दूसरा वहां जाने के लिए सबसे बढ़िया है , साइकल रिक्शा।

    वेद जी क्या कहना चाह रहे है , हम समझते हैं।
    लेकिन जो है , उसी का आनंद लेने में क्या हर्ज़ है।
    मैं हैरान हूँ की अब तक कैसे बहुत सी चीज़ें ऐसी हैं जो हमने नहीं देखी , दिल्ली में रहते हुए भी।

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